महाभारत बहुत महत्व का महाकाव्य है हिन्दू समाज इस काव्य से बहुत सिख लेता है भगवान कृष्ण का प्रभाव तो सर्व दूर ,सर्वव्यापक तो है ही।पर महाभारत के भी नकारात्मक पात्र है उसका प्रभाव भी हिन्दू समाज पर है।
हम लोग महाभारत से इतना ज्यादा प्रभावित रहते है कि हमारे व्यक्तिगत जीवन का कोई भी काम ऐसा नही है जो इस महाकाव्य में वर्णित न हो।
मतदाता के रूप में हम लोग जब धृतराष्ट्र बन जाते है तो राष्ट्र को दुःख भोगना पड़ता है जब हम गांधारी हो जाते है बच्चे दुर्योधन दुशासन जैसे होने लगते है।
देखो नाम ही कितना जबरदस्त है
सु शासन जो गांधारी का पुत्र है पर गांधारी के आंख पर पट्टी है जिस कारण उसके अधर्मी कार्यो को देख कर वो उसको टोक नही सकती है जिस कारण वो दु शासन बनता है।
अब आप पधारिये कुंती की तरफ।
वो अपने बच्चों को धर्म के लिए लड़ना सिखाती है वो गुरु जनों का सम्मान करना सिखाती है वो नारी का सम्मान सिखाती है उसके बच्चे स्वयं दानमित्र- धर्म-शक्ति-भक्ति-समर्पण-सौंदर्य है।कर्ण उसका बच्चा जरूर है पर परिश्थिति वश उसका शिक्षण वो नही कर पाई थी इस कारण वो स्वार्थ वशीभूत दुर्योधन के साथ है उसके लिये तो स्वयं का स्वार्थ ही सब भले किसी स्त्री का अपमान करना पड़ जाए पर वो तथाकथित मित्र धर्म निभाता है जाने ऐसे मित्र धर्म की किसने महिमा गाई?पर भगवान ने नही गाई भगवान भी तो मित्र है न?उनका एक नाम ही मित्र है।
छोड़िए उस बात को।
तो मैं बता रहा था कि कुंती ने अपने बच्चों को बनाया ऐसा बनाया ऐसा बनाया कि भगवना तक को उसका सारथी बनने को विवश होना पड़ा।याने भगवान को आना पड़ा झूठा पत्तल उठाने।सारा मजमा जमा है हजारो राजे रजवाड़े है खूब ऐश्वर्य बिखरा है और उधर हमारे भगवान ऋषियों के झूठे पत्तल उठा रहे है।
जय श्री कृष्ण।
पर शास्त्र तो उस महायज्ञ को भी चंद पंक्तियों में व्यर्थ बता देते है अगर आपने स्वयं भूखे रहकर भी दूसरे को खिलाया हो।पूरा ब्राह्मण परिवार समाप्त एक भिक्षुक की याचना में उसकी क्षुब्धा शांत करने में।
दरिद्र नारायण भगवान की जय।
और उस के पड़े झूठन से नेवला सोने का हो जाता है पर उसका आधा अंग भगवान द्वारा उठाए गए पत्तलों से भी नही होता सोने का।
कितना कठिन है इस समझना?
विधाता की विधि तो स्वयं विधाता ही जानता है।
तो कुंती अपने दिव्यांग जेठ-जेठानी की सेवा करने नियमित राजमहल जाती है अपने देवर-देवरानी को भी मार्ग दिखाती है अपने बच्चों को सन्देश भेज करधर्मयुद्ध के लिए भी तैयार करती है सामान्य नागरिक जन आदि जो उससे मिलने आते है उनको भी धर्म की प्रेरणा देती है।
पर क्या उसकी किसी से भी आसक्ति है?क्या उसका किसी से मोह है?
युधिष्ठिर राज जीतने के बाद साम्राज्य का सुख जो कुंती ने भी नही भोगा अपनी माँ के चरण में समर्पित करने आता है और उनको राजमहल चलने का कहता है।
पर कुंती उसको धर्म का गृहस्थी का अध्यात्म का उपदेश देती है और कहती है कि प्रजा पालन ही क्षत्रिय धर्म है उसके लिए ही त्याग पूर्वक उपभोग करना।पर मैं तो मेरे माता-पिता तुल्य दिव्यांग जेठ-जेठानी के साथ वन गमन करूंगी और कृष्ण नाम लेते लेते ही प्राण त्याग करूंगी।
जब जोधपुर निर्वाचन आयोग के आंख पर पट्टी बांध कर मतदान न करें वाला एड देखा तो मेरे मन ये सब विचार उमड़ घूमड कर आये तो सोचा उसको अभिव्यक्त कर दूं।
जय श्री कृष्ण।
जय जय श्री राम
Tuesday, November 20, 2018
आंख पर पट्टी बांध कर गांधारी न बनें, धर्म युद्ध के लिए सनद कुंती बनें
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment