Wednesday, November 7, 2018

पूज्य स्वामी ईश्वरानंद गिरी जी महाराज की प्रथम पुण्यतिथि पर उनके संस्मरण।

आज हमारे गुरुदेव पूज्य स्वामी ईश्वरानंद गिरी जी महाराज की पुण्य तिथि है संयोग से आज दीपोत्सव भी चल रहा है तो मुझे एक ऐसे ही दीपोत्सव के समय पूज्य श्री के साथ बिताए कुछ पल स्मरण में आ रहे है जिसको मेने अपने जीवन का ध्येय बनाने का प्रयास किया है कर रहा हूँ और पूज्य श्री का आशीर्वाद रहा तो आगे भी सहाय होंगे।
21 अक्टूम्बर 2006 की दीपावली सन्त सरोवर माउंट आबू पर ऐसा संयोग प्राप्त हुवा था स्वामी जी का सुबह 7 बजे सभी को दर्शन का लाभ प्राप्त हुवा या उसके पहले आ गए थे अभी ठीक से याद नहीं।सुबह सुबह महादेव की पूजा अर्चना के बाद मन अत्यधिक प्रसन्न था बहुत कम भक्त थे तो सरलता से बातचीत हो सकती थी मेरा कार्य तो केवल श्रवण करना ही था गुरू मुख से निकले गए ब्रह्म वाक्य जो सुनने में अमृत समान जान पड़ते थे उनको मैं सावधन होके सुन रहा था।स्वामी जी प्लेसमेंट के बाद उत्साहित एक विद्यार्थी साधक को सम्बोधित कर के कह रहे थे जिसको जॉब पर लगना था
"सारे विश्व को जान लिया पर आत्मा को न जाना तो इसका क्या अर्थ?
युवावस्था में लगता है कि सब चलता है देख लेंगे जो होगा जो?
पर आत्मा का संधान जरूरी है।
इसी आत्म साधना में जीवन के कर्म करते हुए "नाम" कमाना "धन" आए या न आए परवाह नहीं।
आत्म धन कमाना लौकिक धन जे साथ जरूरी है।"
उस क्षण मेरे पास न मोबाइल था न ही डायरी पर मैने स्मरण रखने की कोशिश की जो ही वो सत्संग पूरा हुवा समय मिलते ही इसको लिपिबद्ध करने की कोशिश की।सत्य है कि शब्द ये नही थे मुझे केवल भाव याद रहा।मेने उतना ही पकड़ा या पकड़ने की कोशिश की।
हमारे गुरूदेव "मेकेनिकल इंजीनियर" थे और जिस समय।उन्होंने डिग्री की थी उस समय के अभियन्ता दुर्लभ होते थे अगर उनको संसार का तनिक भी मोह होता तो उनके कदमो में बड़ा साम्राज्य होता।
अपने सभी प्रवचनों में वेदान्त,भक्ति,विज्ञान, इतिहास,परपंरा,इंजीनियरिंग,मेडिकल,आगम,साधना,तंत्र और भी बहुत ऐसा गूंथते थे कि साधक उस समय निश्चित ही संसार को भूल जाता।ऐसा हमारे अनेकों गुरू भ्राताओ का अनुभव है।
आज ही के दिन उन्होंने अपना ये चोला उतार दिया।पर उनके विचार सनातन है
हम सबके लिए पाथेय है गुरुदेव दुनिया इधर से उधर हो जावें पर हम आपके इन सिद्धान्तो पर ही चलने की कोशिश करेंगे।निरन्तर करेंगे।
जय गुरूदेव
जय शंकर।
शत शत नमन

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