Wednesday, December 12, 2018

जाती तू कब जाती?

देखो भाई अनाप शनाप वंचित वर्गों को कोसने से कुछ होगा नहीं।आपका आकलन गलत है बिल्कुल।
आपकी पराजय आपके जातीय खुमार का नतीजा है जो भौंडापन आपने जाती के नाम से पिछले कुछ महीनों में बहुत ज्यादा और लगभग रोज दिखाया है।समाजिक न्याय के लिए काम करने वाले लोगों ने बहुत पहले चेता दिया था कि जाती का उभार बहुत खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है।जाती अपने मूल चरित्र में हिन्दुओ की दुश्मन है ऐसा सभी जानते है पर मानते नहीं है जाती के उन्माद में कुछ नही सूझता है दूसरे लोग बौने नजर आते हैं।इस उन्माद को प्रश्रय देने से उन्माद ही पनपता है और फिर ये किसी ईमानदार नेक दिल सज्जन व्यक्तियों के लिए थोड़ी पनपता है ये तो माफियाओ, ठगों,बेईमानो,गुंडो के लिए पनपता है उसका नतीजा वो हो होता है जो होना है।
जातीय गुट बनाके सत्ता को हड़प जाने की आसुरी भूख का सबसे बड़ा शत्रु ही हिंदुत्व होता है जो समानता न्याय धर्म अनुशासन संयम जाने कौन कौन से बंधन में बांधता जाता है इसलिए एक बहुत ही सामान्य अनुभव है कि सभी प्रकार के जातिवादी तत्व संघ को उसके स्वयंसेवको को अपना व्यक्तिगत शत्रु मानते है।अब चूंकि हिन्दू राजनीति में सभी जातियो के साथ साथ सामाजिक न्याय समता बंधुत्व और प्रेम की अनुगूंज है तो वो स्थापित सत्ता अधिष्ठानों को हजम नहीं होती है मजबूरी में वे चुप रहे है उसका अर्थ ये नही कि वो साथ हैं।बस समय की प्रतीक्षा में है।
बाकी तो सब फर्जी नारे है  और नारों के क्या......।
अतः बाबा साहब अम्बेडकर की बात हमेशा स्मरण में रखना कि हिन्दुओ ने जाती नहीं छोड़ी तो हिन्दुओ का जाती बचाना भी कठिन हो जाएगा।

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