चित्तौड़ से बढ़ कर
प्रेम की दूजी मिसाल कहा होगी
देखो इस धरती को
प्रेम की खातिर
वासन्ती आग लेली
उस आग को सीने में बसाए
नर मुंडो की माला जप ली
मिलन हुवा धूम्र में
नवयौवना वीर का
अग्नि ही प्रेम की ज्वाला बनी
समिधा उसमे
चित्तौड़ का रजपूती वैभव सारा
घी के
माँ का उजियारा
हम पूत कपूत है
जो माँ के बलिदान पर हंसते है
माँ के त्याग पर वैभब रचते है
हे माँ!!हम तेरे अपराधी
हे माँ!! क्षमाहमको
मत रूठना हमसे
तू ही तो प्रताप से
महावीरों की जननी
Saturday, February 10, 2018
रजपूती बासन्ती प्रेम
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