Saturday, February 10, 2018

अस्तेन मा ईशत

वैदिक धर्म तेजस्विता और पराक्रम का धर्म है हिन्दुओ ने जब से इस धर्म का त्याग किया तब से हिन्दुओ का पराक्रम चला गया है सर्व दूर हमको चोर उच्चके ही प्रभावी दिखाई देते है ऐसा क्यों?
क्योंकि यजुर्वेद का पहला ही सुक्त कहता है
व:  स्तेन मा ईशत।
अवंशस: व: मा ईशत।
तुम पर चोर डाकू लोग स्वामित्व प्राप्त न करें।
दुष्ट पाप कर्म में प्रेरित करने वाले स्वामित्व प्राप्त नही करें।
गौपतो ध्रुवा: बन्हि स्यात
बहुत बड़ी संख्या में तुम गौपतो याने भूमि के स्वामी याने गौ के स्वामी याने यजमानों के साथ बने रहो।
ध्यान देने वाली बात है यहां पांच आज्ञा बहुत स्पष्ट है
1 चोरो और डाकुओ को सर मत चढ़ाओ उनके स्वामित्व को नही स्वीकारो,बल्कि सच्चे और निस्वार्थ लोगों का शासन मानो
2 दुष्टता में पाप कर्म में प्रेरणा देने वाले भी स्वामी न बनें।
3 गौ पति के पक्ष में रहो।गौ का एक अर्थ होता है गाय एक अर्थ होता है भूमि, उसका स्वामी।लेकिन इस भूमि का स्वामी माने कैसा भी राजा हो वैसा नही बल्कि यज्ञ के यजमाम भाव से राज करने वाला,इस शरीर में इंद्रियों रूपी गौ का स्वामी जीवात्मा उसके साथ रहना याने ईश्वर के साथ रहना।
4 ध्रुव-माने दृढ़ता पूर्वक रहना।मानये स्थिर रहना।कैसा स्थिर?यजमान भाव से राज करने वाले के साथ रहना ही है कभी  नही डिगना।
5बन्हि-मतलब बहुत बड़ी संख्या में।याने संख्या का बहुत महत्व है।
कोई एक  दो नही बहुत बड़ी संख्या।सारा राष्ट्र एक हो जाये वेसी संख्या।
ये यज्ञ है सामूहिक कर्म।इसको अकेले नही करना है पूरे राष्ट्र के साथ करना है किसके पक्ष में करना है इंद्रियों को जीतने वाले के पक्ष में करना है बहुत बड़ी संख्या केसाथ करना है क्यों?
दुष्ट पापकर्म करने की प्रेरणा देने वाले ठग चोर डाकू हमारे स्वामी न बन जाये।
बोलो उससे स्पष्ट कुछ कहूँ?
जो गौपतो है उसके साथ मैं ध्रुव हूँ और अकेले ध्रुव नही हूँ बल्कि बन्हि हूँ।
क्यों हूँ
वः अस्तेन मा ईशत..........

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