Tuesday, February 20, 2018

बाबारामदेव के स्वानुभव पर जातिवादी लोगों के क्षोभ पर

अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म्। होता॑रं रत्न॒धात॑मम्। 1-1
यहां से वेद की ऋग्वेद संहिता आरम्भ होती है और समाप्त कहाँ होती है?
स॒मा॒नी व॒ आकू॑तिः समा॒ना हृद॑यानि वः । स॒मा॒नम॑स्तु वो॒ मनो॒ यथा॑ व॒: सुस॒हास॑ति ॥४॥10/191/4
बस इससे ज्यादा कुछ ब्राह्मणत्व नहीं।इन दो मन्त्रो का ही विचार करते तो भी ये अवस्था प्राप्त नही होती।ये सत्य है कि राष्ट्र में अग्नि को मैं पुरोहित ही प्रज्ज्वलित करूंगा।ये अग्नि है जो हृदयाकाश से लेके अखण्डकाश तक प्रवाहित होगी इसका अरणि से ब्राह्मण ही निकालेगा अग्रणी वो ही है परमात्मा ने नियत कर रखा है उसे किसका अनुसरण करना?किससे द्वेष या ईर्ष्या या भेद रखना?उसको तो कम दे रखा है न?इन 1024 सूक्तों तक ले जाते हुवे सुसहासती तक लेजाना।जहां हमारे मन हृदय तक समान हो जाते है।हमारे गुरु जी कहते थे ये भारत राष्ट्र वेद धर्म को लेके चला है वेद लुप्त हो गया तो भारत लुप्त हो जाएगा पूरे मानव समुदाय के चौथाई भाग को इसके संरक्षण के लिए ही नियुक्त किया है।
इसमे कोई भोग ऐश्वर्य है?कोई सरल मार्ग है?क्या कठिन?कठिनतम।ब्राह्मणत्व को लेके चलने वाले को किसी से कोई अपेक्षा नही होती इस जगत में ऐसा कुछ भी नही जो उसको कुछ भी दे सकता है न ही ऐसा कुछ है जो उससे लिया जा सकता है।स्वयं को ब्राह्मण मानने से कर्त्तव्य बोध बहुत बढ़ जाता है मुझे बहुत पीड़ा होती है जब एक भी सूक्त तक परम्परा से नही जानने वाले ब्राह्मण ब्राह्मण करते रहते है वेद नही तो ब्राह्मण नहीं।
तुम्हारा सारा महत्व वेद को पिछले 2500 सालों से लगातार आक्रमण के बाद भी बचा लेने से है तुम्हारी कसौटी कोई आधुनिक साधन नही है तुम्हारी कसौटी तो तुम्हारे अपने पूर्वज ही है जो किसी भी राज सत्ता से कैसी भी अपेक्षा नही रख कर सम्पूर्ण मानव को धर्म पर चलाते थे बड़े बड़े राजे महाराजे आके चरण छूते थे
आप थे कि ये पता नही सायं भोजन क्या बनेगा।
ये ही ब्राह्मणत्व उसको अपनाना ही ब्राह्मण होना है अतः फालतू का समय किसी महात्मा की आलोचना में व्यर्थ जाया करने की जगह उसको ही पकड़ो।तुम्हारी पोल एक क्षण में खुल जाती है इस क्षण हिंदूवादी होते ही अगले क्षण कुछ और हो जाते हो...........
सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒ सं वो॒ मनां॑सि जानताम् । दे॒वा भा॒गं यथा॒ पूर्वे॑ संजाना॒ना उ॒पास॑ते ॥२॥

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