एक निष्ठावान हिन्दू होने के नाते मुझे गधा बहुत याद आता है जब बहुत गधे की ढेंचू ढेंचू सुनता तो मैं दौड़ कर बाहर भागता था और उस समय घर मे सब बड़े हंसते थे गधों का झुंड निकलता था आगे एक लड़का उस पर बैठा होता था एक या दो नीचे चलते थे विशेष प्रकार की आवाज निकालते जाते थे मुझे उनको देखने का बहुत मजा आता।
फिर कभी कभी मौहल्ले में वैरागियों का झुंड आता जो अपने साथ एक हाथी लाता।उस हाथी को केला या गुड़ देना पड़ता था पांच रुपये तक देते तो बहुत खुश होता उसका महावत साधु।मुझे उसके पास जाते डर लगता था साधु बच्चों को उठा कर ले जाते है ये धारणा सकारण ही हिन्दू समाज मे आज भी दृढ़ है।लेकिन इस तरह मैं हाथी को देख लेता।प्रति वर्ष मेरे घर मे बिल्लियों का एक समूह जरूर आता।वो पड़ोस आनन्द के घर से मेरे घर मे आते उसके आगे तापी बावड़ी थी जिसे छत पर वो बच्चे देती थी फिर आस पास के सब घरो के बच्चे उसके स्वाभाविक अभिभावक होते।एक दिन गर्मियों में मध्य रात्रि में तापी बावड़ी की छत पर दो कुत्तों और एक बिल्ली की फाइट आज भी गुदगुदाती है छत के पास ही बालाजी मंदिर का गुम्बद है जिस पर हनुमान जी मन्दिर की पताका है जो तेज हवा में लहर लाती रहती है एक दिन सांय में मेरे दो दोस्त और मैं मेरी छत पर बैठे थे तेज हवा चल रही थी थोड़ी थोड़ी देर में छम छम की आवाज आती।बिल्ली गुराति थी दोनो बहुत डर गए और नीचे आने का कहने लगे।खैर।
बिल्लियों के बच्चे बहुत उद्यमी होते थे दूध गिरा देते थे उनकी पोटी भी अनेक बार दूध जैसी होती।हमारे लिए रहस्य ही रहता ये क्या है।कभी कभी रात को ऐसे रोते थे कि लगता था गहन अंधकार में तापी बावड़ी में कोई बच्चा रो रहा है।बिल्लियों को लेके झगड़ा भी बहुत हो जाता था।
कुत्ते भी बच्चा देते थे पर उनको छूने की मनाही थी कुत्ती के सम्बंध में बहुत से मिथक चलते थे वो अपने बच्चे को उठाने की कोशिश में बच्चों के कान को खा जाती है ये सबसे बड़ा लगता था।
गर्मी की छुट्टियों में मामा के घर या कभी कभी मेरे घर ही लँगूर हनुमान दिख जाता था सुबह सुबह आंख खोलते ही अगर काले मुंह वाला लँगूर दिख जाए तो भय मिश्रति भाव की बस कल्पना कर सकते हो।ढप्पे ने ऐसे एक लँगूर को थप्पड़ मार दिया था ये किवंदती बन गया है घर मे।
लंगूरों का झुंड होता है वो पेड़ो पर उछलते कूदते मजा देते है।
कुत्ते को रोटी जो कटोरदान में सबसे लास्ट की होती है वो हमेशा खा जाता फिर झगड़ा होता।पहली रोटी गाय की जाने वो क्यो अच्छी लगती।
हां चिड़ियाए।वो तो मेरे घर की शान थी।जाने कितने सालो पुराना घोंसला।किवंदती है कि 100 साल पुराना है कौन जाने।
छत पर से हजारो की तादात में पक्षी उड़ते थे।उनको देखते देखते गदाधर की समाधि लग गई थी ये बहुत बचपन मे ही मेने सुन रखा था तो मैं सोचता था मेरे भी लग जायेगी।पक्षी सब तरह के थे विदेशी भी देशी भी विद्यामन्दिर जाते समय गुलाब सागर के वट पीपल पर हजारो के तादात में थे।दुर्लभ से दुर्लभ।
पक्षियों के कल कल से समाधि तो कभी नही लगी,पर किताब पढ़ने का बहुत अभ्यास हुवा सामने मेहरानगढ़ की पृष्ठभूमि छत की भिंडी का सहारा आधी धूप छाव।बाएं हाथ की तरफ से आती राम धुन या कोई वेद मन्त्र की धुन।कभी कभी शाम जे समय घनश्याम जी की आरती की आवाज।मुल्ले का हल्का सा भोंपू।आज बस भोंपु है बाकी बन्द है खैर।
कभी कभी सांप के निकलने की खबर आती तो उसको देखने हुजूम उमड़ता।जो सांप को पकड़ के लाया वो हीरो होता।भुआ जी के यहां खरोगोश और कछवे को हाथ मे लेने का भी अनुभव मजेदार होता।
चूहा......👍गणेश जी का वाहन।वो तो जैसे एक साथ डर और सम्मान का पात्र है।अभी कुछ महीने पहले ही तापी वाले घर मे मेरे से ऊपर से निकल गया।इतना भय हुवा कि.....।
छिपकली बहुत डराती है कॉकरोच से भी ज्यादा।अंकल जी तो उसे पकड़ लेते है।मोर तो जैसे हमारी शान है मन्दिरो के छत पर घूमते थे उनके पंख के किस्से तो आज भी बहु प्रचारित है।मेढ़क अगर मूत्र कर देगा तो फलां हो जाएगा पर टर टर आह आ।बिच्छू बहुत शैतान है बाप रे।कंसल पकड़ो सांप जितना साहस देगा।चींटी तो ज्ञान का भंडार है दादा सा कितनी ही कहानी सुनाते इस पर।तेंदुए पर खुद की कहानी गल्प लगती तो भी सुनता।शिवाजी शाखा पर अत्यंत जल्दी करीब सवा पांच बजे एक बार ललित जी भाई साहब ने कहा ध्यान से सुनो।शेर की दहाड़ थी।बोले यहा सर्दियों में आती है चिड़ियाघर से आवाज।ये आज भी आश्चर्य है इतना दूर था लेकिन थी वो ही।मछ्ली को आटा देना ही है।
गाय?
खाने के सामने ही आती..........अगर पानी गिरा कर भी भगाया तो अपराध बोध रहता।भैंस मजेदार।घोड़े तो ताकतवर है जी।कौवा चील बाज गिद्ध आदि को उछाल उछाल के खाना देते थे बहादुर जी के घर वाले हम सिर्फ आवाज सुनते चिल्लो की।टिलोदी कबूतर गिलहरी कमेडी तोता कोयल मेना........।गूगल की खुशबू तुलसी निम बबूल...........
हां ये ही है हिन्दू संस्कृति..........कुछ अलग हो तो बताना।
दुर्भाग्य आने वाले बच्चों का की बहुत से नही होंगे.....
Saturday, February 3, 2018
मेरे बचपन के जीव और हिन्दू संस्कृति
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