Thursday, March 22, 2018

कर्मयोगी भगत सिंह

मुझे ऐसे बहुत लोग मिलें ऑनलाइन जो कहते थे की वीर सावरकर नास्तिक थे।खास कर ऑरकुट पर तो इस तरह के पेज में मेरी बहुत डिबेट होती तो वहां भी ये लोग सावरकर को नास्तिक घोषित करते थे।मुझे मराठी नही आती है अनुवाद खूब पढा उसमे कभी नही लगा कि वो नास्तिक थे फिर संघ के वरिष्ठ प्रचारक से पूछा तो उन्होंने तो बहुत से सन्दर्भ दिए।
उसी तरह भगतसिंह के लिए भी पहला काम राष्ट्र को आजाद कराना था भगत सिंह ने अपने पत्र में साफ़ साफ़ कहा था कि उसके साथ के सब क्रांतिकारी आर्यसमाजी वैदिक और उपनिषद को मानने वाले है।उसके पिताजी आर्यसमाजी है वे उनको पूजा करने को प्रेरित करते रहते है।उनके एक मित्र ने तो उलाहना भी दी कि प्रसिध्दि के कारण तुम नास्तिक हो रहे हो।
लेकिन भगतसिंह इस जन्म में ही संसार को समानता स्वतन्त्रता शोषण मुक्त बनाने की कोशिश में थे वो किसी भी स्वर्गस्थ ईश्वर की प्रतीक्षा में अकर्मण्य नही होना चाहते थे और उनको उस समय तक जितना भी धर्म पता चला वो लौकिकता को छोड़ अलौकिकता के पिछे था या वैसा उन्होंने समझा।जो उनको स्वीकार नही था वो तो कर्मयोगी थे और बिना गीता को सिखे वो कर्मयोगी थे देखिये आप उसके उसी मैं नास्तिक क्यों हूँ में विचार " विश्वास’ कष्टों को हलका कर देता है। यहाँ तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है। ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सान्त्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर करना पड़ता है। तूफ़ान और झंझावात के बीच अपने पाँवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है। परीक्षा की इन घड़ियों में अहंकार यदि है, तो भाप बन कर उड़ जाता है और मनुष्य अपने विश्वास को ठुकराने का साहस नहीं कर पाता। यदि ऐसा करता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उसके पास सिर्फ़ अहंकार नहीं वरन् कोई अन्य शक्ति है। आज बिलकुल वैसी ही स्थिति है। निर्णय का पूरा-पूरा पता है। एक सप्ताह के अन्दर ही यह घोषित हो जायेगा कि मैं अपना जीवन एक ध्येय पर न्योछावर करने जा रहा हूँ। इस विचार के अतिरिक्त और क्या सान्त्वना हो सकती है? ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म पर राजा होने की आशा कर सकता है। एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनन्द की तथा अपने कष्टों और बलिदान के लिये पुरस्कार की कल्पना कर सकता है। किन्तु मैं क्या आशा करूँ? मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा – वह अन्तिम क्षण होगा। मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जायेगी। आगे कुछ न रहेगा। एक छोटी सी जूझती हुई ज़िन्दगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक पुरस्कार होगी – यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस हो। बिना किसी स्वार्थ के यहाँ या यहाँ के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को स्वतन्त्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है, क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था। जिस दिन हमें इस मनोवृत्ति के बहुत-से पुरुष और महिलाएँ मिल जायेंगे, जो अपने जीवन को मनुष्य की सेवा और पीड़ित मानवता के उद्धार के अतिरिक्त कहीं समर्पित कर ही नहीं सकते, उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारम्भ होगा। वे शोषकों, उत्पीड़कों और अत्याचारियों को चुनौती देने के लिये उत्प्रेरित होंगे। इस लिये नहीं कि उन्हें राजा बनना है या कोई अन्य पुरस्कार प्राप्त करना है यहाँ या अगले जन्म में या मृत्योपरान्त स्वर्ग में। उन्हें तो मानवता की गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंकने और मुक्ति एवं शान्ति स्थापित करने के लिये इस मार्ग को अपनाना होगा। क्या वे उस रास्ते पर चलेंगे जो उनके अपने लिये ख़तरनाक किन्तु उनकी महान आत्मा के लिये एक मात्र कल्पनीय रास्ता है। क्या इस महान ध्येय के प्रति उनके गर्व को अहंकार कहकर उसका गलत अर्थ लगाया जायेगा? कौन इस प्रकार के घृणित विशेषण बोलने का साहस करेगा? या तो वह मूर्ख है या धूर्त। हमें चाहिए कि उसे क्षमा कर दें, क्योंकि वह उस हृदय में उद्वेलित उच्च विचारों, भावनाओं, आवेगों तथा उनकी गहराई को महसूस नहीं कर सकता। उसका हृदय मांस के एक टुकड़े की तरह मृत है। उसकी आँखों पर अन्य स्वार्थों के प्रेतों की छाया पड़ने से वे कमज़ोर हो गयी हैं। स्वयं पर भरोसा रखने के गुण को सदैव अहंकार की संज्ञा दी जा सकती है। यह दुखपूर्ण और कष्टप्रद है, पर चारा ही क्या है?"
अब इसको पढ़ कर क्या लगता है??वो एक कर्मयोगी थे??इसके अलावा कुछ ओर हो नही सकते।उल्लेखनीय है कि लोकमान्य तिलक ने गीता का जो व्याख्या गीता रहस्य किया है उसमें भी उसी कर्म का ही यशोगान है।स्वामी विवेकानन्द जी के शब्दों में उसे कहूँ तो भारत को आज सत गुण की आवश्यता नही है आवश्यकता है सर से लेके नख तक रोम रोम को हिला देने वाले रजो गुण की।
ये भगतसिंह का वो ही तीव्र रजो गुण है जो उस समय आध्यात्मिकता की आड़ में तम गुण को प्रशंसित करने का विरोध करता है और कहता है कि 
हाँ मैं नास्तिक हूँ।
स्वामी जी कहते है पुराना धर्म कहता है ईश्वर में विश्वास नया धर्म कहता है अपने में विश्वास।
अगर तुम अपने में विश्वास करते हो तो नास्तिक नही हो।

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