कभी राजे सरदार अपने राज्य की सीमाएं लिखते थे दूसरों के लहू से। फिर सेठ साहूकार अपनी हवेलियों के नक्शे लिखते रहें दूसरों के लहू से। अब आपकी डिंग है कि आप की कविता लहू से लिखी जा रही है। पर किसके लहू से? आपका अपना तो वह नहीं है। यह मान भी लें कि आपको दूसरों का गम बहुत है- या कम आराम के साथ है; पर अगर आपकी कविता भी दूसरों के लहू से लिखी गई है, या कम से कम आपके अपने लहू से नहीं लिखी गई है, तो मुझे क्यों उसे उसकी कविता से अच्छा ही मानना चाहिए जिसने अपनी कविता खून से तो नहीं लिखी थी, पर अपने पसीने से लिखी थी तो अपने पसीने से लिखी थी, या सपनों से ही लिखी थी तो अपने सपनों से लिखी थी?- और आप को सुख देने के लिए और आपके सुख में अपना सुख मानते हुए लिखी थी? क्या आप लोगों की बात करके, या इस ढंग के कहके, मूल्यांकन की सारी प्रक्रिया को ही उचित नहीं कर रहे हैं?-अज्ञेय
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