Friday, March 23, 2018

शास्त्री शिवराम हरि राजगुरु

क्रान्तिकारियो की तश्वीरें आपने देखी होगी सभी बलिष्ठ और सुदर्शन नौजवान थे उन सबमें शिवराम हरि राजगुरु कृशकाय थे आप संस्कृत भाषा के विद्वान और लेखक थे और तर्कशास्त्र के जानकार थे।बाबा राव सावरकर से प्रभावित होकर आप क्रांति में सम्मिलती हुवे थे हनुमान प्रसार सिमिति में सबसे पहले जुड़े जो अखाड़ा चलाते थे और बुद्धि में वृध्दि करने सावरकर और विभिन्न क्रान्तिकारियो की जीवनियां पढ़ते पढ़ाते थे आपने काशी जाके पढ़ने का निश्चय किया आप काशी गए वहां आप संस्कृत का अध्ययन करने लगे मन मे अदम्य देशभक्ति थी ही तो वहां भी वो क्रान्ति कार्यो में रुचि लेने लगे।आजाद से भेंट के बाद तो पूरा ही क्रांतिकारी बन गए।
एक दिन आजाद ने सभी को बताया किआ अंग्रेज पुलिस के अत्याचारों को सहने योग्य शरीर को सख्त बनाना होगा।उस दिन बिना किसी को बताये राजगुरु रसोई में गए और चाकू को गर्म किया रक्त तप्त हो गया तो उसे अपने सीने में लगा दिया ऐसा सात बार किया।मुंह पर शिकन तक नहीं।
रात्रि में जब बहुत दर्द से नींद में ही आवाज आई तब पता चला आजाद को।
आप वीर सावरकर के परम भक्त थे आपने ही भगतसिंह कल हिन्दूपादपदशाही पुस्तक भगतसिंह को दी थी जिसके अनेको कोट्स भगतसिंह ने अपनी जेल की डायरी में किये है ये पुस्तक अंग्रेजो को तलाशी में राजगुरु के समान से मिली थी।आप का जीवंत सम्पर्क डॉक्टर हेडगेवार से था संघ की स्थापना के बाद एक बार ये फरारी में नागपुर आये थे डॉक्टर जी से मिले थे तब डॉक्टर जी ने उनको एक कर्तकर्त्ता के घर छुपा कर रखा था।
आपका स्वभाव हँसमुख था और आप ईश्वर के परमभक्त थे।भगतसिंह से आपकी मजाक नुमा नोकझोंक चलती रहती थी जब भगतसिंह ने इनको दूध पिला कर भूख हड़ताल से हटवाया तो इनको मजाक में बोले कि तुम सोचते हो कि मेरे से पहले पहुंच जाओगे पर मैं ऐसा होने नही दूंगा अब तो जवाब में शिवराम ने कहा कि मैने सोचा था कि स्वर्ग में पहले जाके तुम्हारे लिए कमरा बुक रखूंगा पर अब ये हो नही सकेगा।
इनके बहुत से विनोद पूर्ण किस्से भगतसिंह और आजाद के साथ के है।

No comments:

Post a Comment