शास्त्रों में बहुत वैज्ञानिक तरीके से बताया है मनुष्य प्रत्येक कार्य काम के वशीभूत करता है काम का एक अर्थ इच्छा होता है एक अर्थ होता है वासना।काम माने प्राप्त करना।लौकिक या परलौकिक।कंचन कामिनी कीर्ति प्राप्त करना।सृजन करना।निर्माण करना।आश्चर्य ये कि ध्वंस करना भी काम से ही होता है।
जिसकी कोई इच्छा नही इस लोक परलोक में उसे कुछ भी प्राप्त करना नही वो सापेक्ष नही रहता है।निरपेक्ष रहकर कर्तव्य कर्म करता है।काम को नियंत्रित किया जाता है परिवार जनों और गुरु जनो के मार्गदर्शन में,शास्त्र के अध्य्यन और अनुपालन में कानून के जोर से।मनुष्य अनुशासन में बांध कर काम को नियंत्रित करता है भारत का संविधान प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा को धर्म सम्मत बनाता है कि इच्छा पूर्ति के मार्ग भी युगानुकूल नीति सम्मत हो।अनीति से काम की पूर्ति नही हो सकती।
भोग न भोक्ता वयमेव भोक्ता शास्त्र वचन है।अब काम मे मनुष्य को अतृप्त इच्छाओ में कृत्रिम पदार्थ उत्प्रेरक का काम करते है मदिरा, अफीम,ड्रग्स,चाय,कॉपी आदि आदि कैसा भी नशा।इनसे दूर रहने की शास्त्र की आज्ञा है स्पष्ट।
देखिये मानव मात्र को ज्ञान देने वाले वेद क्या कहते है इस को श्री डॉक्टर विवेक जी आर्य के अनुवाद से लिया है -
१. वेद में मनुष्य को सात मर्यादायों का पालन करना निर्देश दिया गया हैं- सन्दर्भ ऋग्वेद 10/5/6 इन सात मर्यादाओं में से कोई एक का भी सेवन नहीं करता हैं तो वह पापी हो जाता हैं।
२. शराबी लोग मस्त होकर आपस में नग्न होकर झगड़ा करते और अण्ड बण्ड बकते हैं। - ऋग्वेद 8/2/12
३. सुरा और जुए से व्यक्ति अधर्म में प्रवृत होता हैं- ऋग्वेद 7/86/6
४. मांस, शराब और जुआ ये तीनों निंदनीय और वर्जित हैं। - अथर्ववेद 6/70/1
अब आप विचार करिये इस प्रकार के काम को बढ़ाने वाले पदार्थों के निरन्तर सेवन से क्या होगा?
अब क्या लौकिक पदार्थ ही नशे को बढ़ाते है?जवाब है नहीं।
जाती और मजहब दो ऐसे तत्व है जो भी मादकता को बढ़ाने का काम करते है जो मादकता मात्र खुद के इच्छा को तुष्ट करने वाली होती है।
शास्त्र कहता है जिसमे इच्छा है काम है उसमें लौकिक अंह भी होता है।वैसे प्रत्येक का अपना अपना अंह अपना मैं पना है जो समष्टि के "मैं" से एकाकार है लेकिन वो अंह इस लौकिक अंह से अलग है जिसकी चर्चा बाद में कभी करेंगे।तो काम जो है वो इस अंह के समानुपाती है जो जो काम की पूर्ति होती है व्यक्ति का अंह तुष्ट होता जाता है जैसे ऊपर बताया कि काम की कभी पूर्ति होनी नही और ये लौकिकअंह कभी तुष्ट होना नही।सारा संसार निगल लो फिर नही प्यासे ही रहोगे।
अतः मनुष्य को इस आधारभूत गुणों को समझना चाहिए तद अनुसार आचरण करना चाहिए।जब तक हम उन मूलभूत गुणों पर चलेंगे तब तक ही वे प्रकृति प्रदत्त गुण हमारा रक्षण करेंगे।अंह पर चोट पड़ने से ही क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध में बुद्धि भृमित हो जाती है जिसे भगवान ने गीता में कहा है
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।2.63।।
2.63।।क्रोधसे संमोह अर्थात् कर्तव्यअकर्तव्यविषयक अविवेक उत्पन्न होता है क्योंकि क्रोधी मनुष्य मोहित होकर गुरुको ( बड़ेको ) भी गोली दे दिया करता है।
मोहसे स्मृतिका विभ्रम होता है अर्थात् शास्त्र और आचार्यद्वारा सुने हुए उपदेशके संस्कारोंसे जो स्मृति उत्पन्न होती है उसके प्रकट होनेका निमित्त प्राप्त होनेपर वह प्रकट नहीं होती।
इस प्रकार स्मृतिविभ्रम होनेसे बुद्धिका नाश हो जाता है। अन्तःकरणमें कार्यअकार्यविषयक विवेचनकी योग्यताका न रहना बुद्धिका नाश कहा जाता है।
बुद्धिका नाश होनेसे ( यह मनुष्य ) नष्ट हो जाता है क्योंकि वह तबतक ही मनुष्य है जबतक उसका अन्तःकरण कार्यअकार्यके विवेचनमें समर्थ है ऐसी योग्यता न रहनेपर मनुष्य नष्टप्राय ( मनुष्यतासे हीन ) हो जाता है।
अतः उस अन्तःकरणकी ( विवेकशक्तिरूप ) बुद्धिका नाश होनेसे पुरुषका नाश हो जाता है। इस कथनका यह अभिप्राय है कि वह पुरुषार्थके अयोग्य हो जाता है।
स्पष्ट है कि क्रोध मोह अंह हिंसा प्रतिहिंसा बर्बरता राग द्वेष लोभ आदि सब मानवीय दुर्गुण है और मानव में है तो प्रत्येक मानव के रिलीजन मजहब नस्लो में है और मानव उस नाते ही कर्म करता है।
समस्या ये है कि बहुत से मानव समुदायों ने वैश्विक मानवीय गुणों अवगुणों को अपना हथियार बना रखा है इस हथियारों के साधन से वो लोग अपना अपना मजहब बढ़ाते है मजहबी आसुरी वृत्ति मनुष्य को एक तरह बन कर सभी कुछ हड़पने की भले ही वो अधर्म संगत हो भले ही वो संविधान विरुद्ध हो भलेही वो मानवता विरुद्ध हो वो लोग इस प्रकार की कुचेष्टाओं को करते रहते है जिससे मानव समुदाय में एक साम्य बिगड़ जाता है और उस साम्य के बिगड़ जाने से कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ जाती है।
अब संविधान के तहत कार्य करने वाले लोगों को चाहिए कि वो लोग इस गम्भीर तत्व को समझें और उस हिसाब से आचरण करें।
भारत ही नही विश्व मे जिहाद आज एक ऐसा शब्द बन गया है जो हिंसा प्रतिहिंसा की आसुरी वृत्ति को बढ़ा रहा है जिसके पीछे का अगर हम विचार करे तो लौकिक या अलौकिक भोगों को भोगने की आसुरी इच्छा दिखाई देती है जो काम का ही एक विकृत रूप है इस जिहाद ने उस साम्य को पिछले बहुत सालो से बिगाड़ रखा है आजकल तो एक निकृष्ट रूप चल पड़ा है जिसमें पहले हिन्दू या सिख या पारसी या जैन या क्रिश्चन लड़की को मोह के आवरण में भरमाया जाता है इसका पूरा का पूरा एक तंत्र है जो इसमे काम करता है.
अत हिन्दू धर्म के इन बुनियादी सिद्धान्तों को समझ कर ही इस लव जिहाद के खिलाफ काम करना चाहिए।अविवेवकी जन इस में सहायक हो जायँगे विवेकी व्यक्ति ही प्रतीक्षा करेगा।

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