ब्रह्मसूत्र वेदान्त परम्परा का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जिस पर अनेक महात्माओ ने भाष्य टीका आदी लिखा है सबसे महत्वपूर्ण भाष्य इसमें शारीरिक भाष्य है जो भगवान शंकराचार्य जी ने लिखा है अथातो ब्रह्म जिज्ञासा से ये ब्रह्मसूत्र शुरू होता है।सूत्र रूप में लिखित ये वेदांत का मर्म है ब्रह्म ज्ञान है और अतीव दुरूह और कठिन है आधुनिक युग में अनेक महात्माओ ने भी इस पर टीका लिखी है और अनेक महात्माओ के प्रवचन है।सरल भाषा में इस ब्रह्म विद्या पर वृन्दावन के स्वामी अखण्डानन्द जी ने इसके चतु सूत्री पर तिन खण्डों में प्रवचन दिया था जिज्ञासु साधको के लिए बहुत उपयोगी है।
वेदांत परम्परा में व्यक्ति जब यात्रा आरम्भ करता है तो उसका जीवन का दृष्टिकोण बदल जाता है उसके जीवन को देखने का नजरिया बदल जाता है।
इस संसार में किसी भी वस्तु में सार नही है सब के सब सार है समस्या ये है कि हम लोग प्रतिक्षा करते है जीवन में कोई दुःख या कष्ट के आने की या फ़ीर इसे सन्यासियो के लिए छोड़ देते है या फिर वृद्धावस्था के लिए।
ये विद्या तो गृहस्थ धर्म में यौवन में ही सिखने की है ताकि जीवन संग्राम के हर क्षण में इसकी अनुभूति हो।
हर क्षण हर पल हर व्यक्ति हर घटना दुर्घटना सुख दुःख सब का सब उस ब्रह्म का ही स्मित हास्य है। और उसके इस हास्य को भी हास्य के साथ ही देखना चाहिए।
ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या।
Thursday, December 28, 2017
ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या
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