Saturday, August 27, 2011

मेरी एक कविता जो मेने एक निजी कंपनी छोड़ते समय लिखी थी ......

क्या जीवन ! यंत्रवत चलते रहना???
भोतिकी में दिन भर खपना,रात्रि में करना उसका चिंतन!!
नश्वर-नस्ट होने वाली वस्तु के पीछे घुमते जाना यु ही उम्र भर|
अंत समय में कहना ,गर्व से छोड़ा मेने पीछे अपने ,बंगा पुत्र-परिवार||
जीवंत-चेतन्य खोजता जड़ को,महामाया के चक्र ,पिसना हें जीवन?
या शांति पाने जाना मंदिर बाबा का,लोटकर लगाना फिर काम यंत्रणा का??

शुचिता,सात्विकता विनम्रता नहीं |
आडम्बर भ्रष्टता विकृति जीवन ||

नवीनता के लिए छोड़े जो संस्कृत |
समाज जीवन हो केसे सुसंस्कृत ||

धन धन धन पाना जहा हें सुख |
ए चाहे कही सधन हो तो कहे का दुःख ||

धन लेन की जुगत में,चिंतन को कुंद किया
सत्य का दम तोड़,असत्य आचरण किया||

नेतिक मूल्यों से पतित पूरा राष्ट्र जा रहा रसातल,
कह रहा इसको देखो हमारा Developments
professionalism कर रहा दुषित मन जीवन भाषा,
तोल रहा अपना ,उन्नत हुवा जीवन स्तर||

वस्तुए करती सभ्यता को उन्नत,तो भगवान राम नहीं रावण होता|
जय श्री कृष्ण नहीं कंस जय गान होता||

जीवन नहीं मादकता में डूबना|
जीवन नहीं कामोपभोग मापना||
जीवन नहीं संगृह करना धन को|
जीवन नहीं बढाना मात्र परिवार को अपणे||

जीवन तो चलना संवित पथ पर,जीवन चलना संघ मार्ग पर,
जीवन तो जीना ध्येय अनुसार,ज्ञान के मार्ग पर||
प्रकाश के आंगन पर चेतन्य्वत निरंतर

भा" में रत "रत" भारत....................

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