3।जाती क्या है??कैसे ये उत्पन्न हुई ???क्या महत्व है इसका??क्या गुण अवगुण है इसके??कैसे ये शोषण का हथियार बनी?? इन सबको को जानने से पहले ये जानना पड़ेगा की ये पैदा कहा से हुयी है इस के पैदा होने के भी अनेक कारण दिये गए है जो विदेशियों व भारतीय विद्धवनों ने दिये है उनको नीचे प्रस्तुत करता हूँ
A।परंपरागत {traditional} सिद्धांत –खास बात यह है की वर्ण और जाती को एक मानकर ही यह सिद्धांत दिया गया है जिसके अनुसार उस अंगो से जाती की उततापति हुयी है जिसका खंडन मेने पहले ही कर दिया है|
B राजनीतिक सिद्धांत{थियरि ऑफ पॉलिटिकल }- पहले मैं इसके बारे में बताता हूँ-प्रांभिक यूरोपियन विधवानों ने जाती प्रथा को ब्रहमनों द्वारा आयोजित एक चतुर राजनेतीक योजना का रूप बताया है|इन मे “अबे डुबायस{abb dubois}” का नाम प्रमुख है आप कहते है की ब्राह्मणों ने अपनी प्रभुता बनाए रखने के लिए धर्म का सहारा लिया और एसी व्यवस्था बनाई जिसमे अपना स्थान सबसे ऊपर रखा और उन लोगो को द्वितीय स्थान दिया जोकि अपने बाहुबल से ब्रहनों के स्वार्थ की रक्षा कर सके याने क्षत्रिय |विदेशी इबेटसन{ibetson} और डॉक्टर घूरिए{ghurye} ने भी इनका समर्थन किया है
अब इसकी काट में-जाती एक सामाजिक संस्था है व कम से कम भारत मे 2000 साल से अस्तित्व में है अत: यह कहना की 2000 साल से भारत एक कृतिम आवरण को ढ़ोह रहा है मूर्खता के अलावा क्या होगी??एक कहावत है की आप सबको एक समय के लिए मूर्ख बना सकते हो कुछ को सब समय के लिए मूर्ख बना सकते हो पर सबको सब समय के लिए मूर्ख नहीं बना सकते इस कारण इस सामाजिक ढ़ाचे को खड़ा करना व इतने लंबे समय तक चलाये रखना व सारे समाज का इसको पालन करना उस सबका उत्त्र्दायित्व ब्राह्मण के कंधो पर डाल कर अंग्रेज़ ये साबित करना चाहते थे की सारी कुरुती व सारी गरीबी छूआ छूत आदि का कारण ब्राह्मण है इस कारण उसे प्रताड़ित करने मे हमारा याने अंग्रेज़ो का सहयोग दो ,पर एसा करना अंग्रेज़ क्यो चाहते थे??तो कारण ध्यान मे आता है ब्राह्मणों ने कभी भी अंग्रेज़ो की प्रतिष्ठा को हिन्दु समाज ही नहीं सारे भारतीय समाज मे नहीं बढ़ने दिया सभी उनसे घृणा करते थे एक तो अंग्रेज़ो के पाप भी बहुत थे दूसरे ब्राह्मण लोग हमेशा हिन्दु जनता को अंग्रेज़ो के खिलाफ भड़काते रहते थे उनके भारत में राज को चुनोती देते थे ये मात्र एक संयोग नहीं है की वसुदेव बलवंत फडके से लेकर मंगल पांडे या तिलक महाराज तक सारे के सारे जातिगत ब्राह्मण थे और इनकी बात सारा समाज सुनता था जब तक अंग्रेज़ो ने मैकाले के माध्यम से एक पीढ़ी की पीढ़ी नहीं तैयार कर ली तब तक ये अंग्रेज़ भारत मे बहुत ही घृणा से देखे जाने लगे थे |वास्तव में किसी भी सामाजिक प्रथा या व्यवस्था को चतुराई से या कृत्रिम रूप से समाज पर नहीं लादा जा सकता है |
3 धार्मिक सिद्धान्त {religious theory}- होकार्ट व सेनार्ट नाम के विदेशियों का यह सिद्धान्त था जिसके अनुसार धार्मिक बलि की परंपरा व भोजन संबधि आदतों प्रतिबंधों के कारण जाती की उत्पत्ति हुयी थी |पर ये कितना बकवास है की खुद विदेशियों जैसे डालमेन ने इसका विरोध किया व इसे अवैज्ञानिक तक कह दिया भला एक सामाजिक ढ़ाचे को खड़ा करने मे भोजन का ही योगदान होगा क्या??
4।व्यावसायिक सिद्धान्त {occupation theory}-पेशो के आधार पर जातिप्रथा की उत्पत्ति की व्याख्या नेसफील्ड ने प्रस्तुत की थी |आप लिखते है {function and function alone is responsible for the origin of cast system-nesfield.brief view of the cast system.p-7}विभिन्न जातियो मे जो भेद हमे दिखाई देता है वो उनके पेशे के कारण ही है पेशो की उचता व नीचता या अच्छाई बुराई के अनुसार ही जाती प्रथा के उच्च नीच का संस्तरण हुवा है इसमे धर्म का कोई महत्व नहीं है ना शारीरिक लक्षणों का महत्व है |आपके विरोधी हट्टन व डीएन मज़मूदार है जो यह कहते है की खेती करने वाले सारे एक जाती के नहीं है व ब्राह्मण व शूद्र की बनावट मे भी अंतर है पर मेरे विचार से अंग्रेज़ो व मुगलो ने बहुत बड़े समाज को जबर्दस्ती खेती के लिए बाध्य किया था जबकि प्रत्येक का अलग अलग व्यवसाय था जिसकी योजना बद्ध तरीके से हत्या कर पूरे के पूरे समाज को खेती पर निर्भर करवाया गया |
5 उद्विकासीय सिद्धान्त {evolution theory}-डेनजिंल इबेटसन ने दिया था इसका कारण था आर्थिक संघ |आर्थिक वर्ग से आथिक संघ बने फिर संघ से जाती का विकास हुवा ना वर्ण कारण था ना धर्म ना नस्ल |
6।प्रजातीय सिद्धान्त {racial theory}-सर हर्बर्ट रिजले ने सव्र्प्रथम इस सिद्धान्त को दिया था उसके बाद मैकाइवर,मैक्स वेबर,क्रौबर,भारतीय सर एस सी राय,एन के दत्ता घूरिए मजमूदार ने भी पुर ज़ोर से समर्थन किया |आर्य द्रविड,अनुलोम प्रतिलोम विवाह ,आर्य आक्रमण व स्त्रियो की कमी,द्रविड जीवन की उन्न्त अवस्था मातृसत्तात्मक समाज ,प्रजातियों में संघर्ष,ब्राह्मणों के कारण आदि कारण दिये गए है
|बिना किसी बड़े नाम को लिए हुवे मैं कह सकता हूँ पूरी तरीके से बकवास क्योकि भौगलिक समानता पर ज्यादा प्रजातीय या नस्लीय भेद नहीं होता है व डीएनए पद्धति पर शोध के बाद यह प्रमाणित हो चुका है की कम से कम 30 हजार साल से भारत में एक समाज रह रहा है जबकि ये सारा पूर्वाग्रह केवल 1500 ईसा पूर्व तक का ही है फिर द्रविड़ तो स्थान वाचक है व आर्य एक विशेषण शव्द |
7 आदिम संस्कृति का सिद्धान्त {theory of primitive culture}-आर्यों के आने से पहले ही कबीले जो जाती के रूप मे थे जो यह मानते थे की दूसरों को छूने से बीमार आदि हो जाते है हट्ट्न उसे “माना” कहते है जो आलोकिक शक्ति है जो प्रत्येक चीज मे पायी जाती है जो दूसरों से छूने या स्पर्श करने या संबध बनाने पर अच्छा या बुरा प्रभाव डालती है |
आप खुद सोचिए की ये कोई तर्क है??एसा लगता है हालीवुड फिल्म अवतार का सीन है ये |
8। सांस्कृतिक एकीकन का भाव {theory ऑफ culture integration}-राय बहादुर शरत चंद्र राय ने दिया था भारत की विभिन्न प्रजातियों की सांस्कृतिक विशेषताओ के मिलन और अंत: क्रिया का फल है जातिया |
मेरे इस संक्षेप मे जातियो के सिद्धान्त को बताने का प्रयोजन केवल इतना सा था की मैं आपको बता सकु की अंग्रेज़ या दूसरे विदेशी और उनके भारतीय चेले क्या क्या सोचते थे आप खुद सोच सकते है की एक अवैज्ञानिक तरीके से जातियो की मनमानी व्याख्या कर किस तरह ब्राह्मणो के माथे मढ़ने का सफलता पूर्वक प्रयास किया गया है जबकि निष्पक्ष विदधानों ने स्पष्टतया इसे पेशे व आर्थिक संघो से उत्पन्न माना है अब भी अगर कोई नस्ल वादी दृष्टि से सोचे तो क्या उसे वैज्ञानिक सोच का कहेंगे??सत्य बात तो ये है की जाती व्यवस्था हर जगह है वहा भी है जहा ब्राह्मण है वहा भी है जहा वो नहीं है| शोषण वहा भी है जहा ब्राह्मण है और वहा भी है जहा ब्राह्मण नहीं है |कमजोर को सब सताते है पालीवालों के एक गाँव केवल इस लिए उजाड़ गया था की उस राजी का राजा अनैतिक मांग कर रहा था जिसे पूरा करना पालीवालो को अपमान जनक लगा था इसी तरह हर कमजोर व्यक्ति जाती समाज शोषण का शिकार बनता है जहा जो जाती ताकतवर होती है वहा वो अपनी प्रभु सत्ता चलना चाहती है व कमजोरों का शोषण भी करती है भारत के लोगो ने बहुत पहले इस बात का हल निकाल दिया था व स्पष्ट रूप से सभी को सम्मान्न देने का आगृह किया जाता था |
जारी है ............................
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