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Sunday, January 21, 2018

गृहस्थ धर्म मे प्रवेश के समय लिखी काव्य समिधा

आज से मेरा धर्म बदल जायेगा
कुछ पुराना छूट जायेगा
कुछ नया जुड़ जायेगा.
ये नयी राह आसन नहीँ होगी
ये नई उमंग कठिन ही होगी
ये पथ काँटों  का ही तुम देना
मार्ग सुगम हो तो
चलने का मजा ही क्या
सोचा था कभी
गँगा का तट होगा
फूस का झौपडा होगा
मात्र कोपीन  होगा
ईश्वर भक्ति में हाथ आगे हो
उसमे जो आ जाये वो
मधुकरी सी
वेदांत का श्रवण मनन
शिव ज्ञानेन जीवन
शायद  अब फ़िर कभी
फ़िर कभी
फक्कड़ से आ के जो
मिले  मस्ती वाले
पागलों की जमात में
स्वागत है तुम्हारा
स्वागत  है तुम्हारा  Shobhana Joshi
निश्चय जीवन सत 
चित  आन्नदमय
संवित मय जीवन
निरंतर कष्ट देना
माँ तुम
हम दोनो तनिक भी
तुमको न भूलें
तेरे ही प्रताप से
तीर गये करोडो जीवन
हम दोनो को देना
तुम आशीर्वाद भगवती
धर्ममय गृहस्थ बसाये
सम्वित मय जीवन बसाये
संघ मय कर्म बसाये
पर हित मय मन बनाये
गँगा तीर का झौपडा
सा निश्छल निर्मल
जीवन होगा
सखि  वैसा ही
पवित्र आँगन होगा
वैसा ही
पवित्र आनंद  होगा