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Thursday, February 22, 2018

हिंदुत्व का दर्शन सामाजिक समानता का दर्शन

हिंदुत्व के दर्शन में मनुष्य की आध्यात्मिक और समाजिक समानता की बात कही गई है.
छान्दोग्य उपनिषद में गाड़ीवान रैक्क जो वर्तमान जाती व्यवस्था के हिसाब से ऋषि नहीँ होता है पर वैदिक परम्परा में उसे वेदिक सूक्त का ऋषि कहाँ है उससे शिक्षा लेने के लिये ब्राह्मण और राजकुमार आते है उस आख्यान में ब्रह्म ऋषि रैक्क कहते है कि तुम लोग शोक से मोहित मत होवो शुद्रता को प्राप्त मत होवो.
साफ है ये जाती का नहीँ है ये वचन गुण का है.
सामाजिक समरसता तब ही आती है जब मन में किसी के प्रति न तो घृणा न ही हीनता का भाव हो.
स्वामी विवेकानंद जी कहते है कि तभी और तुम तभी हिंदू कहलाने के अधिकारी हो जब तुम्हारे हृदय में अज्ञानी हिंदू पीडित हिंदू दलित हिंदू शोषित हिंदू के प्रति न केवल  बंधुत्व हो बल्कि तुम उसके लिये कार्य भी करो.भारत का भाग्य उस दिन ही डूब गया था जब हजारो विद्वान करोड़ों भूखे प्यासौ और शोषित लोगों कि उन्नति की परवाह किये बगैर इस बात के लिये बहस करते रहे कि आचमन किस हाथ से करें??
हिन्दुओ ने बहुत पहले ही सिद्धांत से मान लिया था कि चींटी से लेके हाथी तक ब्राह्मण से लेके चांडाल तक सब उस ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है
ये सोच समरसता के लिये बहुत प्रेरणादायीं है अत जब हम संघ की प्राथना में वयम उच्चारण करते है तब वो किसी जाती का न होकर हिन्दुओ का है और अगर गहराई से विचार करे तो तो वो वयम मानव मात्र का भी है.
व्यस्टि  से समष्टि की ये यात्रा किसी जाती की नहीँ है सर्व भूतों की है.
ईश्वर सर्व भूतानाम हृदय तिषट्ति अर्जुन.
इस को ही जीवन में उतारना समरसता है इस ओर जितना क़दम बढे उतना ही हम हिंदुत्व के नज़दीक आयेंगे.