मेने भारत एक आहत सभ्यता को बार बार पढ़ा। लेखक ने एक बाहरी और एक भारतीय दोनो की भूमिका का एक साथ निर्वाह किया है।गांधी,गरीबी और बाहरी आध्यत्मिक पुट की समालोचना सोचने को मजबूर कर देती है शिवसेना की मजदूर शाखा के झोपड़पट्टी वासी की झोपड़ी में बाबा साहब की तश्वीर और वहां का वर्णन जीवन्त जान पड़ता है।
नायपॉल का अपने आस पास के घटनाक्रम का वर्णन सजीव हो उठता है एमन्ग द बिलिवर्स एक तरीके से भविष्यवाणी है विश्व ने जो isis जैसे को भोगा व भोग रहा है उसके बीज की व्याख्या बड़े सलीके से बताई है।
रामजन्म भूमि जन आंदोलन को हिन्दुओ और हिंदुस्थान का एक नया करवट एक अध्याय मानने वाले चंद लेखकों में से एक।
खरी खरी लिखने की जिद्द ही नोबल में देरी करवाती है।
शत शत नमन।
हिंदुओं को अपने हीरे की परख नहीं है ये नायपॉल को देख के पता चल जाता है।
Sunday, August 12, 2018
नायपॉल का चला जाना
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