Tuesday, July 17, 2018

अग्नि परीक्षा

सुनो जानकी!!बूझो एक कहानी क्या तुम रोषित हो अपमानित हो लेकर #अग्निपरीक्षा की रवानी??
गम्भीर हो कर पूछा
अगस्त पत्नी ने,
बताओ व्यथा तुम्हारी क्या तुम्हारे मन में
सुनकर जरा सी चोंकी जानकी
कुछ मचलाई सी
तत्प् ताम्र मुख से बोली हर्षाई सी
क्षमा करना भगवती
माता हो आप हमारी
कुछ कटु बोल  जाऊ तो
राम मेरे ईश्वर है,
राम मेरे जगदीश है,
श्रद्धा है विश्वास है,
मेरे जीवन की धड़कन
मेरे रोम रोम की आश है
नही ली मेरी कभी परीक्षा,
न कोई अपमान किया,
मेरे खातिर बहाया लहू,
अपना श्रम साध्य किया
अग्नि है मुर्ख स्त्रियों पुरुषो की वाणी
अग्नि है राम द्रोही की निशानी
मैं राम की ह्र्दयगामिनि
कोई पापी दुरात्मा होगा
जो करेगा राम से द्रोह,
रावण मेरे तेज को,
सहन नही कर सकता था,
मित्र मन्दोदरि सारा तारा त्रिजटा के आदेश को रोक नही सकता था
नाना सुमाली के संदेशो को लांघ कैसे वो आ सकता था
मूर्खो की ही है वाणी जो रावण का गुणगान करती हो कलियुग में आएगा समय ऐसा
यवनो के प्रवाह में उन्मुक्त
जीवन की चाह में नर नारी होंगे बर्बाद
उनको सीताराम का आदर्श ही बचाएगा
रहेगा हरदम साथ
जो उनमें से प्रभावित होंगे
वो सीताराम का अपमान करेंगे
नित नए निर्लज्ज आरोप से
चरित्र अपना खराब करेंगे
सबसे बड़ा है माते रामसीता का प्रेम
मेरे वो मैं उनकी
बाकी कौन होते है पूछने वाले??
राम ने मुझे हमेशा बराबर माना दिया
धनुष कटी पर खड्ग बाँधा सुनो देवी!!
मैं रण का सञ्चालन करती थी
घायल पीड़ित सेना का चिकित्सा मैं करती थी
हम तीनो ने मिलकर दंडकारण्य राक्षस शून्य किया ऋषि जीवन को निरापद किया माते
जो भी सीताराम द्रोही हो तुम करना उनका निषेध
असज्जन पापी और भर्मित जीव ही राम द्रोह पाते है
पर वो पिता समान सबको क्षमा करते जाते है
क्षमा करते जाते है।-

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